प्रभु का नेत्र दर्शन
जब भी हम भगवान के दर्शन करने जाते हैं,
तब कुछ लोग बड़ी शीघ्रता करते हैं –
शीघ्र प्रसाद चढ़ाना, शीघ्र प्रणाम करना और शीघ्र प्रार्थना करके निकल जाना।
पर यदि भगवान के सच्चे दर्शन करना है और आप स्वयं को पाना चाहते हैं,
तो जैसे हम अपने अपनों से मिलने जाते हैं, उन्हें अच्छे से देखते-निहारते हैं,
उनसे हाल पूछते हैं – वैसे ही व्यवहार भगवान से भी करें।
खुद में सुधार करना हो तब भी यही करें कि भगवान से अच्छे से मिलें,
उनका हाल पूछें, अपनी बात कहें,
और सबसे विशेष – उनके नेत्रों में अवश्य देखें।
जब आप उनके नेत्रों में देखकर उनसे बात करेंगे,
तब आपका जुड़ाव भगवान से बढ़ेगा
और आपकी बहुत सी बातों में सुधार आएगा –
चरित्र संवर जाएगा, वाणी सुधर जाएगी, मन शुद्ध हो जाएगा
और धीरे-धीरे आप भी संवरने लगेंगे।
अपने इष्ट को यदि पाना है तो ‘नेत्र-दर्शन’ अति आवश्यक है।
नेत्रों के माध्यम से इष्ट का भाव पता चलता है,
सही-गलत में अंतर समझ आने लगता है,
जीवन के कठिन निर्णय लेने की क्षमता आ जाती है
और आप अपने इष्ट के जैसे बनने लगते हैं।
उनके स्वभाव अनुरूप हो जाते हैं,
अपने इष्ट के स्वभाव को आप साध लेते हैं।
यह एक छोटा-सा अनुभव है – अपनाकर देखिए,
मन संभल जाएगा…
— Rashmi Verma